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IGNOU MSW-013 Solved Question Paper PDF

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IGNOU MSW-013 Previous Year Solved Question Paper in Hindi
Q1. परामर्श के व्यावहारिक दृष्टिकोण की व्याख्या कीजिए।
Ans. परामर्श का व्यवहारिक दृष्टिकोण, जिसे व्यवहार चिकित्सा भी कहा जाता है, इस मूल सिद्धांत पर आधारित है कि अधिकांश व्यवहार, चाहे वह अनुकूली हो या कु-अनुकूली, सीखी हुई प्रतिक्रियाएँ हैं। यह दृष्टिकोण सीखने के सिद्धांतों पर केंद्रित है, जिसमें शास्त्रीय अनुबंधन (Classical Conditioning) , क्रियाप्रसूत अनुबंधन (Operant Conditioning) , और सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory) शामिल हैं। व्यवहारिक परामर्श का मुख्य लक्ष्य समस्याग्रस्त या अवांछित व्यवहारों को पहचानना और उन्हें अधिक सकारात्मक और अनुकूली व्यवहारों से बदलना है। यह व्यक्ति के आंतरिक विचारों या भावनाओं के बजाय अवलोकन योग्य व्यवहारों पर ध्यान केंद्रित करता है।
प्रमुख सिद्धांत और अवधारणाएं:
- शास्त्रीय अनुबंधन: इवान पावलोव द्वारा विकसित इस सिद्धांत में, एक स्वाभाविक उद्दीपक (जैसे भोजन) को एक तटस्थ उद्दीपक (जैसे घंटी) के साथ जोड़कर एक सीखी हुई प्रतिक्रिया (लार आना) उत्पन्न की जाती है। परामर्श में, इसका उपयोग भय और फोबिया जैसी प्रतिक्रियाओं को समझने के लिए किया जाता है।
- क्रियाप्रसूत अनुबंधन: बी.एफ. स्किनर द्वारा प्रस्तावित, यह सिद्धांत बताता है कि व्यवहार को उसके परिणामों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सकारात्मक पुनर्बलन (Positive Reinforcement) व्यवहार को मजबूत करता है, जबकि दंड (Punishment) उसे कमजोर करता है।
- सामाजिक अधिगम सिद्धांत: अल्बर्ट बंडुरा का यह सिद्धांत अवलोकन और मॉडलिंग के महत्व पर जोर देता है। व्यक्ति दूसरों के व्यवहार और उसके परिणामों को देखकर सीखते हैं।
प्रमुख व्यवहारिक तकनीकें:
- व्यवस्थित विसुग्राहीकरण (Systematic Desensitization): यह तकनीक विशेष रूप से फोबिया और चिंता विकारों के लिए उपयोग की जाती है। इसमें क्लाइंट को विश्राम तकनीकें सिखाई जाती हैं, फिर उसे धीरे-धीरे भय उत्पन्न करने वाली स्थितियों के एक पदानुक्रम (hierarchy) का सामना करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, जब तक कि चिंता कम न हो जाए।
- फ्लडिंग (Flooding): इस तकनीक में व्यक्ति को बिना किसी पलायन के लंबे समय तक भयभीत करने वाले उद्दीपक के संपर्क में रखा जाता है, जब तक कि उसकी चिंता की प्रतिक्रिया समाप्त न हो जाए।
- विरक्ति चिकित्सा (Aversion Therapy): इसमें एक अवांछनीय व्यवहार (जैसे शराब पीना) को एक अप्रिय उद्दीपक (जैसे मतली लाने वाली दवा) के साथ जोड़ा जाता है ताकि उस व्यवहार के प्रति एक नकारात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न हो।
- टोकन इकोनॉमी (Token Economy): यह क्रियाप्रसूत अनुबंधन पर आधारित है, जहाँ वांछित व्यवहार प्रदर्शित करने के लिए व्यक्तियों को टोकन (जैसे अंक या सितारे) दिए जाते हैं। इन टोकन को बाद में पुरस्कारों या विशेषाधिकारों के लिए बदला जा सकता है।
- मॉडलिंग (Modeling): इसमें परामर्शदाता या अन्य लोग वांछित व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं, ताकि क्लाइंट अवलोकन के माध्यम से सीख सके।
निष्कर्ष रूप में, व्यवहारिक दृष्टिकोण उन समस्याओं के लिए अत्यधिक प्रभावी है जिनकी स्पष्ट व्यवहारिक अभिव्यक्तियाँ होती हैं, जैसे फोबिया, व्यसन और बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं। हालांकि, इसकी आलोचना इस बात के लिए की जाती है कि यह अंतर्निहित संज्ञानात्मक और भावनात्मक कारकों की उपेक्षा कर सकता है।
Q2. बाल्यावस्था में देखे जाने वाले छः मानसिक विकारों का वर्णन कीजिए।
Ans. बाल्यावस्था में देखे जाने वाले मानसिक विकार वे स्थितियाँ हैं जो बच्चे के विकास, सीखने, व्यवहार या भावनाओं को प्रभावित करती हैं। इन विकारों का शीघ्र निदान और हस्तक्षेप महत्वपूर्ण है। बाल्यावस्था में पाए जाने वाले छह प्रमुख मानसिक विकार निम्नलिखित हैं: 1. ध्यान अभाव एवं अतिसक्रियता विकार (Attention-Deficit/Hyperactivity Disorder – ADHD): यह सबसे आम न्यूरोडेवलपमेंटल विकारों में से एक है। इसके मुख्य लक्षण असावधानी (कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई, आसानी से विचलित होना), अतिसक्रियता (लगातार बेचैनी, अत्यधिक दौड़ना या चढ़ना), और आवेग (बिना सोचे-समझे कार्य करना, दूसरों की बातों में बाधा डालना) हैं। ये लक्षण बच्चे के स्कूल के प्रदर्शन और सामाजिक संबंधों में महत्वपूर्ण बाधा डालते हैं। 2. विपक्षी अवज्ञाकारी विकार (Oppositional Defiant Disorder – ODD): इस विकार में बच्चा लगातार नकारात्मक, अवज्ञाकारी और अधिकार-संपन्न व्यक्तियों के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार प्रदर्शित करता है। लक्षणों में अक्सर आपा खोना, बड़ों से बहस करना, जानबूझकर दूसरों को परेशान करना और अपनी गलतियों के लिए दूसरों को दोष देना शामिल है। यह व्यवहार एक सामान्य बच्चे की जिद से कहीं अधिक गंभीर और लगातार होता है। 3. आचरण विकार (Conduct Disorder – CD): यह ODD से अधिक गंभीर विकार है। इसमें बच्चा दूसरों के मूल अधिकारों या उम्र-उपयुक्त सामाजिक मानदंडों का लगातार उल्लंघन करता है। इसके लक्षणों में मनुष्यों और जानवरों के प्रति आक्रामकता (धमकाना, लड़ाई करना, क्रूरता), संपत्ति का विनाश (जानबूझकर आग लगाना), धोखाधड़ी या चोरी , और नियमों का गंभीर उल्लंघन (जैसे स्कूल से भागना) शामिल हैं। 4. पृथक्करण चिंता विकार (Separation Anxiety Disorder – SAD): इस विकार में बच्चा अपने लगाव वाले व्यक्तियों (आमतौर पर माता-पिता) से अलग होने पर अत्यधिक और विकासात्मक रूप से अनुचित भय या चिंता का अनुभव करता है। लक्षणों में अलगाव के बारे में लगातार चिंता, स्कूल जाने से इनकार करना, अलगाव के समय शारीरिक शिकायतें (जैसे सिरदर्द, पेट दर्द), और अकेले सोने में डरना शामिल है। 5. ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (Autism Spectrum Disorder – ASD): यह एक जटिल विकासात्मक स्थिति है जो सामाजिक संचार और बातचीत में लगातार कमी तथा प्रतिबंधित, दोहराव वाले व्यवहार, रुचियों या गतिविधियों के पैटर्न द्वारा पहचानी जाती है। ASD वाले बच्चों को अशाब्दिक संचार (जैसे आँख से संपर्क) को समझने, संबंध बनाने और सामाजिक-भावनात्मक पारस्परिकता में कठिनाई हो सकती है। 6. विशिष्ट शिक्षण विकार (Specific Learning Disorder): यह एक न्यूरोडेवलपमेंटल विकार है जिसमें सामान्य बुद्धि और पर्याप्त स्कूली शिक्षा के बावजूद अकादमिक कौशल सीखने और उपयोग करने में कठिनाइयां होती हैं। यह पढ़ने (डिस्लेक्सिया), लिखने (डिसग्राफिया), या गणित (डिस्कैलकुलिया) जैसे विशिष्ट क्षेत्रों को प्रभावित कर सकता है, जिससे बच्चे के स्कूल के प्रदर्शन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।
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